रिलायंस रिटेल पर उपभोक्ता आयोग का बडा फैसला 5रू ज्यादा वसूली पर 6000रू का मुआवज़ा! जाने क्या है पूरा मामला

उपभोक्ता आयोग का बडा फैसला
जिला उपभोक्ता आयोग रायगढ़ का बडा फैसला! रिलायंस रिटेल ने 5 रुपये ज्यादा लिए, उपभोक्ता को मिला 6,000 रुपये का मुआवज़ा।

उपभोक्ता आयोग का बडा फैसला रायगढ़ (छ.ग.)। उपभोक्ता अधिकारों को लेकर समय-समय पर देशभर के विभिन्न उपभोक्ता आयोगों ने महत्वपूर्ण फैसले सुनाते रहे हैं। इसी कड़ी में जिला उपभोक्ता आयोग रायगढ़ ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने न सिर्फ स्थानीय उपभोक्ताओं को राहत दी है बल्कि यह संदेश भी दिया है कि एमआरपी से अधिक वसूली जैसे मामूली लगने वाले मामले भी गंभीर होते हैंए और इनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
यह मामला “सुरेश सिंह विरूद्व रिलायंस रिटेल लिमिटेड़” का है। इस मामले में जिला उपभोक्ता आयोग रायगढ़ के अध्यक्ष श्री छमेश्वर लाल पटेल, सदस्य श्रीमती राजश्री अग्रवाल, और सदस्य श्री राजेन्द्र कुमार पाण्डेय, की पीठ के द्वारा ने दिनांक 18 सितम्बर 2025 को आदेश पारित किया जिसमे रिलायंस रिटेल लिमिटेड के खिलाफ निर्णय दिया गया, रिलायंस रिटेल को आदेशित किया गया कि वह उपभोक्ता से अतिरिक्त वसूली की गई राशि 5 रूपये के साथा-साथ मानसिक क्षति और वादव्यय के के रूप में कुल 6005/- रू का भुगतान करे।

उपभोक्ता आयोग में दर्ज हुआ मामला – सुरेश सिंह विरुद्ध रिलायंस रिटेल लिमिटेड

यह मामला वर्ष 2025 का है। प्रकरण क्रमांक DC/386/CC/48/2025 सुरेश सिंह नामक उपभोक्ता ने रिलायंस रिटेल लिमिटेड के खिलाफ एक शिकायत दर्ज की। सुरेश सिंह ने रायगढ़ स्थित रिलायंस स्टोर से 4,155/- रुपए की खरीदारी की थी। खरीदे गए सामानों में पोहे का एक पैकेट भी शामिल था, जिस पर एमआरपी 75 रुपए अंकित था। लेकिन जब बिल देखा गया तो पाया कि पोहे का मूल्य 80 रुपए लिया गया है। यानी उपभोक्ता से 5 रुपए अधिक वसूले गए। यह अंतर भले ही राशि के हिसाब से छोटा लगे, लेकिन यह उपभोक्ता अधिकारों का सीधा उल्लंघन था।
उपभोक्ता ने इस बारे में राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (एनसीएच) में भी शिकायत दर्ज की, लेकिन संतोषजनक समाधान न मिलने पर मामला रायगढ़ उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा। शिकायतकर्ता ने उपभोक्ता आयोग के सामने यह दलील दी कि यदि कंपनियाँ इस तरह बार-बार एमआरपी से अधिक राशि वसूलेंगी तो उपभोक्ताओं को बड़े पैमाने पर नुकसान उठाना पड़ेगा।

उपभोक्ता आयोग में रिलायंस रिटेल का पक्ष

रिलायंस रिटेल की ओर से उपभोक्ता आयोग के समक्ष यह स्वीकार किया गया कि बिलिंग में तकनीकी खराबी की वजह से गलत राशि दर्ज हो गई थी। कंपनी ने उपभोक्ता से माफी मांगते हुए 5 रुपए वापस करने की पेशकश की। उनका कहना था कि उपभोक्ता का उद्देश्य केवल बड़ी राशि मुआवजे के रूप में हासिल करना है, इसलिए इस शिकायत को खारिज किया जाना चाहिए। कंपनी ने इसे एक ‘टेक्निकल एरर’ बताया और तर्क दिया कि किसी तरह की जानबूझकर की गई लापरवाही इसमें शामिल नहीं है।

आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि रिलायंस रिटेल ने बिलिंग में तकनीकी खराबी को साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया है। आयोग ने यह माना कि जब किसी वस्तु पर एमआरपी स्पष्ट रूप से अंकित है और फिर भी उपभोक्ता से अधिक राशि वसूली जाती है, तो यह कानून का उल्लंघन है।

आयोग ने यह भी कहा कि यह मामला सिर्फ 5/- रुपए की वसूली का नहीं है बल्कि उपभोक्ता अधिकारों और अनुचित व्यापार प्रथाओं से जुड़ा विषय है। यदि कंपनियों को इस तरह की गलती करने की छूट मिल जाए तो वे हर उपभोक्ता से छोटी-छोटी राशि वसूल सकती हैं, जिसका असर सामूहिक रूप से बेहद बड़ा होगा।

उपभोक्ता आयोग का आदेश

आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि रिलायंस रिटेल ने बिलिंग में तकनीकी खराबी को साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया है। आयोग ने यह माना कि जब किसी वस्तु पर एमआरपी स्पष्ट रूप से अंकित है और फिर भी उपभोक्ता से अधिक राशि वसूली जाती है, तो यह कानून का उल्लंघन है।

आयोग ने यह भी कहा कि यह मामला सिर्फ 5/- रुपए की वसूली का नहीं है बल्कि उपभोक्ता अधिकारों और अनुचित व्यापार प्रथाओं से जुड़ा विषय है। यदि कंपनियों को इस तरह की गलती करने की छूट मिल जाए तो वे हर उपभोक्ता से छोटी-छोटी राशि वसूल सकती हैं, जिसका असर सामूहिक रूप से बेहद बड़ा होगा।

18 सितम्बर 2025 को रायगढ़ जिला उपभोक्ता आयोग ने अपना आदेश सुनाते हुए रिलायंस रिटेल लिमिटेड को दोषी ठहराया। आदेश के अनुसार, कंपनी को उपभोक्ता को 5 रुपए (अधिक वसूली गई राशि) 45 दिनों के भीतर लौटाना होगा। यदि इस अवधि में राशि नहीं लौटाई जाती है तो उस पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

इसके साथ ही, आयोग ने मानसिक क्षति के लिए उपभोक्ता को 5,000 रुपए और वाद व्यय के रूप में 1,000 रुपए चुकाने का निर्देश दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि कंपनी अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेगी।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय कई मायनों में महत्वपूर्ण है। सबसे पहली बात, यह उपभोक्ता अधिकारों को मजबूती देने वाला फैसला है। सामान्यतः उपभोक्ता 5-10 रुपए जैसी छोटी रकम के मामलों को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन जब बड़ी कंपनियाँ लाखों ग्राहकों से इसी तरह अतिरिक्त राशि वसूलती हैं, तो यह सामूहिक रूप से करोड़ों में बदल जाता है। रायगढ़ आयोग ने अपने आदेश में यही संदेश दिया कि छोटी राशि का मामला भी उपभोक्ता अधिकारों से सीधा जुड़ा हुआ है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि आयोग ने यह स्पष्ट किया कि तकनीकी खराबी का बहाना देकर कंपनियाँ जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। अगर वास्तव में तकनीकी समस्या थी तो उसका सबूत प्रस्तुत करना कंपनी की जिम्मेदारी थी। बिना सबूत के महज ‘टेक्निकल एरर’ कहकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता।

तीसरी अहम बात यह है कि इस फैसले ने उपभोक्ताओं में जागरूकता फैलाने का काम किया है। अब लोग समझ पाएंगे कि वे चाहे किसी भी बड़ी ब्रांड या कंपनी से सामान खरीदें, यदि उनसे एमआरपी से अधिक राशि वसूली जाती है तो वे कानूनी रूप से न्याय पाने का अधिकार रखते हैं।

इस केस से उपभोक्ताओं को कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं।

’’छोटी राशि को नजरअंदाज न करें’’ 5-10 रुपए जैसी छोटी-छोटी रकम भी अगर बार-बार हजारों उपभोक्ताओं से वसूली जाए तो बड़ी रकम बन जाती है। इसलिए हर उपभोक्ता को अपने अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए।
कंपनियों के लिए संदेश

यह फैसला कंपनियों के लिए भी एक बड़ा सबक है। बड़ी कंपनियों को यह समझना होगा कि उनके पास लाखों ग्राहक हैं और वे उपभोक्ताओं के भरोसे पर टिके हैं। ऐसे में एमआरपी से अधिक राशि वसूलना, चाहे जानबूझकर हो या गलती से, उपभोक्ता के विश्वास को तोड़ता है। कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी बिलिंग प्रणाली पूरी तरह सटीक और पारदर्शी हो।
यदि कंपनियाँ उपभोक्ता अधिकारों का सम्मान नहीं करेंगी तो उन्हें न केवल कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा बल्कि उनकी ब्रांड/छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।

उपभोक्ता आंदोलन की दिशा – भारत में उपभोक्ता आंदोलन धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम और उपभोक्ता आयोगों की सक्रियता ने आम जनता को यह भरोसा दिलाया है कि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सकते हैं। यह फैसला उसी आंदोलन की एक कड़ी है। जब उपभोक्ता छोटी-छोटी बातों पर भी शिकायत दर्ज करेंगे और न्याय पाएंगे, तो कंपनियाँ अधिक सजग होकर काम करेंगी।

उपभोक्ता आयोग का निष्कर्ष

रायगढ़ उपभोक्ता आयोग का यह फैसला इस बात का प्रतीक है कि उपभोक्ता की आवाज चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, अगर वह सही है तो उसे न्याय मिलेगा। यह केवल 5 रुपए की वसूली का मामला नहीं था, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा का मामला था। आयोग ने यह साबित कर दिया कि कानून के नजरिए से छोटी-बड़ी कोई रकम मायने नहीं रखती, बल्कि उपभोक्ता के अधिकार सर्वाेपरि हैं।

’’बिल चेक करना जरूरी है’’ अक्सर उपभोक्ता बिल को ध्यान से नहीं देखते और जल्दबाजी में भुगतान कर देते हैं। लेकिन इस मामले से यह साफ हो गया कि बिलिंग की छोटी सी गलती भी उपभोक्ता के अधिकारों का उल्लंघन हो सकती है।

’’राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन का उपयोग करें’’ यह प्लेटफॉर्म उपभोक्ताओं को प्रारंभिक स्तर पर शिकायत करने का अवसर देता है। यदि वहां से समाधान नहीं मिलता तो उपभोक्ता आयोग तक जाया जा सकता है।

“आदेश की कॉपी डाउनलोड करने के लिए click करें।”

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