सर्वेयर की रिपोर्ट सर्वोपरि: जब बीमा कंपनी पर भारी पड़ा उपभोक्ता आयोग का आदेश : Brijmohan Bolar Vs I.C.I.C.I. Lombard General Insurance Company Limited.

Brijmohan Bolar Vs I.C.I.C.I. Lombard General Insurance Company Limited.

Brijmohan Bolar Vs I.C.I.C.I.

परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Introduction and Historical Background)

Table of Contents

यह लेख जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के एक महत्वपूर्ण निर्णय Brijmohan Bolar Vs I.C.I.C.I. Lombard General Insurance Company Limited. पर आधारित है, जो बीमा दावों के निपटारे में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी को रेखांकित करता है। यह मामला दिखाता है कि कैसे एक सामान्य उपभोक्ता अपनी मेहनत की कमाई और अधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ी बीमा कंपनी के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ सकता है। यह निर्णय न केवल परिवादी (शिकायतकर्ता) को न्याय दिलाता है, बल्कि यह देश के सभी उपभोक्ताओं के लिए एक मिसाल कायम करता है कि अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में कमी के खिलाफ उपभोक्ता मंचों में शिकायत दर्ज करना कितना आवश्यक है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (Consumer Protection Act, 2019) की धारा 35 के तहत यह परिवाद दर्ज किया गया था, जिसने शिकायतों को दर्ज करने की प्रक्रिया को सरल बनाया है। यह अधिनियम उपभोक्ताओं को “जीवन और संपत्ति के लिए परिसंकटमय” वस्तुओं और सेवाओं के विपणन के विरुद्ध संरक्षित होने का अधिकार देता है, साथ ही उन्हें अनुचित व्यापार पद्धतियों के विरुद्ध सूचित किए जाने का अधिकार भी प्रदान करता है। यह मामला स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि बीमा कंपनी द्वारा ग्राहक के वैध दावे को अस्वीकार करना, जिसके लिए उपभोक्ता ने प्रीमियम का भुगतान किया है, सेवा में कमी (Deficiency in Service) की श्रेणी में आता है।

उपभोक्ता न्याय की जीत: बीमा कंपनी द्वारा सेवा में कमी का मामला – Brijmohan Bolar Vs I.C.I.C.I. Lombard General Insurance Company Limited.

परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Introduction and Historical Background)

यह लेख जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के एक महत्वपूर्ण निर्णय पर आधारित है, जो बीमा दावों के निपटारे में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी को रेखांकित करता है। यह मामला दिखाता है कि कैसे एक सामान्य उपभोक्ता अपनी मेहनत की कमाई और अधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ी बीमा कंपनी के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ सकता है। यह निर्णय न केवल परिवादी (शिकायतकर्ता) को न्याय दिलाता है, बल्कि यह देश के सभी उपभोक्ताओं के लिए एक मिसाल कायम करता है कि अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में कमी के खिलाफ उपभोक्ता मंचों में शिकायत दर्ज करना कितना आवश्यक है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (Consumer Protection Act, 2019) की धारा 35 के तहत यह परिवाद दर्ज किया गया था, जिसने शिकायतों को दर्ज करने की प्रक्रिया को सरल बनाया है। यह अधिनियम उपभोक्ताओं को “जीवन और संपत्ति के लिए परिसंकटमय” वस्तुओं और सेवाओं के विपणन के विरुद्ध संरक्षित होने का अधिकार देता है, साथ ही उन्हें अनुचित व्यापार पद्धतियों के विरुद्ध सूचित किए जाने का अधिकार भी प्रदान करता है। यह मामला स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि बीमा कंपनी द्वारा ग्राहक के वैध दावे को अस्वीकार करना, जिसके लिए उपभोक्ता ने प्रीमियम का भुगतान किया है, सेवा में कमी (Deficiency in Service) की श्रेणी में आता है।


पार्टी, अधिवक्ता और न्यायिक पीठ (Parties, Advocates, and Judicial Bench)

इस परिवाद प्रकरण में शामिल पक्ष और कानूनी प्रतिनिधि निम्नलिखित थे:

विवरण (Detail)परिवादी (Complainant)विरोधी पक्ष (Opposite Party)
नामबृजमोहन बोलर पिता मनोहरलाल बोलर, उम्र-46 वर्ष, निवासी-जवाली पुल के पास मेन रोड जूना बिलासपुर (छ.ग.)प्रबंधक, आई.सी.आई.सी.आई. लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी, मुम्बई (महाराष्ट्र)
अधिवक्ताश्री प्रकाश मिश्राश्री के.बी.श्रीवास्तव

उपभोक्ता न्याय की जीत: बीमा कंपनी द्वारा सेवा में कमी का मामला – Brijmohan Bolar Vs I.C.I.C.I. Lombard General Insurance Company Limited.

परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Introduction and Historical Background)

यह लेख जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के एक महत्वपूर्ण निर्णय पर आधारित है, जो बीमा दावों के निपटारे में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी को रेखांकित करता है। यह मामला दिखाता है कि कैसे एक सामान्य उपभोक्ता अपनी मेहनत की कमाई और अधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ी बीमा कंपनी के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ सकता है। यह निर्णय न केवल परिवादी (शिकायतकर्ता) को न्याय दिलाता है, बल्कि यह देश के सभी उपभोक्ताओं के लिए एक मिसाल कायम करता है कि अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में कमी के खिलाफ उपभोक्ता मंचों में शिकायत दर्ज करना कितना आवश्यक है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (Consumer Protection Act, 2019) की धारा 35 के तहत यह परिवाद दर्ज किया गया था, जिसने शिकायतों को दर्ज करने की प्रक्रिया को सरल बनाया है। यह अधिनियम उपभोक्ताओं को “जीवन और संपत्ति के लिए परिसंकटमय” वस्तुओं और सेवाओं के विपणन के विरुद्ध संरक्षित होने का अधिकार देता है, साथ ही उन्हें अनुचित व्यापार पद्धतियों के विरुद्ध सूचित किए जाने का अधिकार भी प्रदान करता है। यह मामला स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि बीमा कंपनी द्वारा ग्राहक के वैध दावे को अस्वीकार करना, जिसके लिए उपभोक्ता ने प्रीमियम का भुगतान किया है, सेवा में कमी (Deficiency in Service) की श्रेणी में आता है।


पार्टी, अधिवक्ता और न्यायिक पीठ (Parties, Advocates, and Judicial Bench)

इस परिवाद प्रकरण में शामिल पक्ष और कानूनी प्रतिनिधि निम्नलिखित थे:

विवरण (Detail)परिवादी (Complainant)विरोधी पक्ष (Opposite Party)
नामबृजमोहन बोलर पिता मनोहरलाल बोलर, उम्र-46 वर्ष, निवासी-जवाली पुल के पास मेन रोड जूना बिलासपुर (छ.ग.)प्रबंधक, आई.सी.आई.सी.आई. लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी, मुम्बई (महाराष्ट्र)
अधिवक्ताश्री प्रकाश मिश्राश्री के.बी.श्रीवास्तव

इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर की एक प्रतिष्ठित न्यायिक पीठ द्वारा की गई। यह पीठ निम्नलिखित माननीय सदस्यों से बनी थी:

  • माननीय आनंद कुमार सिंघल, अध्यक्ष (Hon’ble Anand Kumar Singhal, President)
  • श्रीमती पूर्णिमा सिंह, सदस्य (Hon’ble Smt. Poornima Singh, Member)
  • आलोक कुमार पाण्डेय, सदस्य (Hon’ble Alok Kumar Pandey, Member)

परिवाद के तथ्य और घटनाक्रम (Facts of the Complaint and Events)

Brijmohan Bolar Vs I.C.I.C.I. Lombard General Insurance Company Limited. परिवाद प्रकरण क्रमांक DC/375/CC/53/2021 था, जिसे 23/02/2021 को आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

मुख्य घटनाक्रम (Key Events):

  1. बीमा पॉलिसी और क्षति: परिवादी बृजमोहन बोलर ने अपने वाहन के लिए विरोधी पक्ष, आई.सी.आई.सी.आई. लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी, से बीमा पॉलिसी ली थी, वाहन को क्षति (नुकसान) पहुंचने पर, परिवादी ने नियमानुसार बीमा कंपनी के समक्ष दावा प्रस्तुत किया।
  2. सर्वेयर की नियुक्ति, दावे के आकलन के लिए, बीमा कंपनी ने एक अधिकृत सर्वेयर (विशेषज्ञ) को नियुक्त किया। सर्वेयर ने वाहन का निरीक्षण किया और क्षति की राशि 98,107/- अन्ठान्बे हजार एक सौ सात रूपये) आंकलित की।
  3. दावे की अस्वीकृति सर्वेयर द्वारा क्षति की राशि निर्धारित किए जाने के बावजूद, विरोधी पक्ष बीमा कंपनी ने परिवादी के दावे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। बीमा कंपनी ने संभवतः किसी पॉलिसी की शर्त या तकनीकी आधार पर दावे को अस्वीकृत किया, हालांकि आयोग ने इन तर्कों को अधिसंभाव्यता की प्रबलता से साबित नहीं माना।
  4. उपभोक्ता आयोग में शिकायत बीमा कंपनी के दावे को अस्वीकार करने के कारण, परिवादी को न केवल आर्थिक नुकसान हुआ, बल्कि मानसिक कष्ट और परेशानी भी झेलनी पड़ी। न्याय प्राप्त करने के लिए, परिवादी ने अपने अधिवक्ता श्री प्रकाश मिश्रा के माध्यम से 23 फरवरी 2021 को जिला उपभोक्ता आयोग, बिलासपुर में परिवाद दर्ज किया।

मुख्य घटनाक्रम (Key Events):

न्यायालय में कानूनी तर्क और साक्ष्य का महत्व (Legal Arguments and Importance of Evidence)मामले में मुख्य बहस इस बात पर केंद्रित थी कि क्या बीमा कंपनी द्वारा दावे को अस्वीकार करना सेवा में कमी (Deficiency in Service) थी।

1. विशेषज्ञ की राय (सर्वेयर रिपोर्ट) का महत्व: न्यायिक प्रक्रिया में विशेषज्ञ (Expert) की राय, जैसे कि बीमा सर्वेयर की रिपोर्ट, एक महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 के तहत, विशेषज्ञ की राय कला, विज्ञान या पहचान के प्रश्नों पर सुसंगत तथ्य मानी जाती है। इस मामले में, सर्वेयर ने क्षति की राशि ₹98,107/- तय की थी। आयोग ने माना कि जब बीमा कंपनी द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ ने स्वयं क्षति की मात्रा का आकलन कर लिया है, तो कंपनी द्वारा उस दावे को अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त मजबूत और साबित किए जा सकने वाले आधार होने चाहिए।

न्यायालय यह सुनिश्चित करता है कि विशेषज्ञ द्वारा दिया गया प्रमाण माननीय है या नहीं। हालाँकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि विशेषज्ञों की राय केवल सलाहकारी प्रकृति की होती है, और न्यायाधीश उस राय के विपरीत भी निर्णय ले सकते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूत कारण बताने होते हैं। इस मामले में, आयोग ने विरोधी पक्ष के तर्कों को सर्वेयर की रिपोर्ट के विपरीत जाकर दावे को अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त नहीं पाया।

2. सेवा में कमी का सिद्ध होना: आयोग ने 10/10/2025 को अंतिम तर्क सुने। गहन विचार-विमर्श के बाद, आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि बीमा कंपनी विरोधी पक्ष द्वारा परिवादी का बीमादावा स्वीकार न किया जाना स्पष्ट रूप से “सेवा में कमी पायी जाती है”। यह निष्कर्ष इस सिद्धांत पर आधारित था कि ग्राहक ने वैध बीमा प्रीमियम का भुगतान किया है, और कंपनी एक वैध दावा प्रस्तुत करने के बाद उसे अस्वीकार करके अपनी सेवा शर्तों को पूरा करने में विफल रही।

उपभोक्ता न्याय की जीत: बीमा कंपनी द्वारा सेवा में कमी का मामला – Brijmohan Bolar Vs I.C.I.C.I. Lombard General Insurance Company Limited.

परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Introduction and Historical Background)

यह लेख जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के एक महत्वपूर्ण निर्णय पर आधारित है, जो बीमा दावों के निपटारे में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी को रेखांकित करता है। यह मामला दिखाता है कि कैसे एक सामान्य उपभोक्ता अपनी मेहनत की कमाई और अधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ी बीमा कंपनी के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ सकता है। यह निर्णय न केवल परिवादी (शिकायतकर्ता) को न्याय दिलाता है, बल्कि यह देश के सभी उपभोक्ताओं के लिए एक मिसाल कायम करता है कि अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में कमी के खिलाफ उपभोक्ता मंचों में शिकायत दर्ज करना कितना आवश्यक है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (Consumer Protection Act, 2019) की धारा 35 के तहत यह परिवाद दर्ज किया गया था, जिसने शिकायतों को दर्ज करने की प्रक्रिया को सरल बनाया है। यह अधिनियम उपभोक्ताओं को “जीवन और संपत्ति के लिए परिसंकटमय” वस्तुओं और सेवाओं के विपणन के विरुद्ध संरक्षित होने का अधिकार देता है, साथ ही उन्हें अनुचित व्यापार पद्धतियों के विरुद्ध सूचित किए जाने का अधिकार भी प्रदान करता है। यह मामला स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि बीमा कंपनी द्वारा ग्राहक के वैध दावे को अस्वीकार करना, जिसके लिए उपभोक्ता ने प्रीमियम का भुगतान किया है, सेवा में कमी (Deficiency in Service) की श्रेणी में आता है।


पार्टी, अधिवक्ता और न्यायिक पीठ (Parties, Advocates, and Judicial Bench)

इस परिवाद प्रकरण में शामिल पक्ष और कानूनी प्रतिनिधि निम्नलिखित थे:

विवरण (Detail)परिवादी (Complainant)विरोधी पक्ष (Opposite Party)
नामबृजमोहन बोलर पिता मनोहरलाल बोलर, उम्र-46 वर्ष, निवासी-जवाली पुल के पास मेन रोड जूना बिलासपुर (छ.ग.)प्रबंधक, आई.सी.आई.सी.आई. लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी, मुम्बई (महाराष्ट्र)
अधिवक्ताश्री प्रकाश मिश्राश्री के.बी.श्रीवास्तव

इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर की एक प्रतिष्ठित न्यायिक पीठ द्वारा की गई। यह पीठ निम्नलिखित माननीय सदस्यों से बनी थी:

  • माननीय आनंद कुमार सिंघल, अध्यक्ष (Hon’ble Anand Kumar Singhal, President)
  • माननीय श्रीमती पूर्णिमा सिंह, सदस्य (Hon’ble Smt. Poornima Singh, Member)
  • माननीय आलोक कुमार पाण्डेय, सदस्य (Hon’ble Alok Kumar Pandey, Member)

परिवाद के तथ्य और घटनाक्रम (Facts of the Complaint and Events)

इस परिवाद प्रकरण का क्रमांक DC/375/CC/53/2021 था, जिसे 23/02/2021 को आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

मुख्य घटनाक्रम (Key Events):

  1. बीमा पॉलिसी और क्षति: परिवादी बृजमोहन बोलर ने अपने वाहन के लिए विरोधी पक्ष, आई.सी.आई.सी.आई. लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी, से बीमा पॉलिसी ली थी। वाहन को क्षति (नुकसान) पहुंचने पर, परिवादी ने नियमानुसार बीमा कंपनी के समक्ष दावा प्रस्तुत किया।
  2. सर्वेयर की नियुक्ति: दावे के आकलन के लिए, बीमा कंपनी ने एक अधिकृत सर्वेयर (विशेषज्ञ) को नियुक्त किया। सर्वेयर ने वाहन का निरीक्षण किया और क्षति की राशि ₹98,107/- (अन्ठान्बे हजार एक सौ सात रूपये) आंकलित की।
  3. दावे की अस्वीकृति: सर्वेयर द्वारा क्षति की राशि निर्धारित किए जाने के बावजूद, विरोधी पक्ष बीमा कंपनी ने परिवादी के दावे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। बीमा कंपनी ने संभवतः किसी पॉलिसी की शर्त या तकनीकी आधार पर दावे को अस्वीकृत किया, हालांकि आयोग ने इन तर्कों को “अधिसंभाव्यता की प्रबलता से साबित नहीं” माना।
  4. उपभोक्ता आयोग में शिकायत: बीमा कंपनी के दावे को अस्वीकार करने के कारण, परिवादी को न केवल आर्थिक नुकसान हुआ, बल्कि मानसिक कष्ट और परेशानी भी झेलनी पड़ी। न्याय प्राप्त करने के लिए, परिवादी ने अपने अधिवक्ता श्री प्रकाश मिश्रा के माध्यम से 23 फरवरी 2021 को जिला उपभोक्ता आयोग, बिलासपुर में परिवाद दर्ज किया।

मामले में मुख्य बहस इस बात पर केंद्रित थी कि क्या बीमा कंपनी द्वारा दावे को अस्वीकार करना सेवा में कमी (Deficiency in Service) थी।

1. विशेषज्ञ की राय (सर्वेयर रिपोर्ट) का महत्व: न्यायिक प्रक्रिया में विशेषज्ञ (Expert) की राय, जैसे कि बीमा सर्वेयर की रिपोर्ट, एक महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 के तहत, विशेषज्ञ की राय कला, विज्ञान या पहचान के प्रश्नों पर सुसंगत तथ्य मानी जाती है। इस मामले में, सर्वेयर ने क्षति की राशि ₹98,107/- तय की थी। आयोग ने माना कि जब बीमा कंपनी द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ ने स्वयं क्षति की मात्रा का आकलन कर लिया है, तो कंपनी द्वारा उस दावे को अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त मजबूत और साबित किए जा सकने वाले आधार होने चाहिए।

न्यायालय यह सुनिश्चित करता है कि विशेषज्ञ द्वारा दिया गया प्रमाण माननीय है या नहीं। हालाँकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि विशेषज्ञों की राय केवल सलाहकारी प्रकृति की होती है, और न्यायाधीश उस राय के विपरीत भी निर्णय ले सकते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूत कारण बताने होते हैं। इस मामले में, आयोग ने विरोधी पक्ष के तर्कों को सर्वेयर की रिपोर्ट के विपरीत जाकर दावे को अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त नहीं पाया।

2. सेवा में कमी का सिद्ध होना: आयोग ने 10/10/2025 को अंतिम तर्क सुने। गहन विचार-विमर्श के बाद, आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि बीमा कंपनी विरोधी पक्ष द्वारा परिवादी का बीमादावा स्वीकार न किया जाना स्पष्ट रूप से “सेवा में कमी पायी जाती है”। यह निष्कर्ष इस सिद्धांत पर आधारित था कि ग्राहक ने वैध बीमा प्रीमियम का भुगतान किया है, और कंपनी एक वैध दावा प्रस्तुत करने के बाद उसे अस्वीकार करके अपनी सेवा शर्तों को पूरा करने में विफल रही।


आदेश, निष्कर्ष और उद्धरण (Conclusion, Order, and Quotes)

न्यायालय ने इस बात को स्थापित किया कि परिवादी बीमित वाहन की क्षति की सर्वेयर द्वारा आंकलित राशि की सीमा तक प्राप्त करने का अधिकारी है, और तद्नुसार परिवाद को स्वीकार कर लिया।

न्यायालय का अंतिम आदेश (The Final Order) (आदेश दिनांक-07/11/2025):

जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर ने निम्नलिखित निर्देशयुक्त आदेश पारित किया:

  1. बीमादावा राशि का भुगतान: विरोधी पक्ष (आई.सी.आई.सी.आई. लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी) आदेश की प्रति प्राप्ति के 45 दिन के अंदर बीमित वाहन में हुई क्षति के मद में सर्वेयर द्वारा आंकलित राशि ₹98,107/- (अन्ठान्बे हजार एक सौ सात रूपये) परिवादी को भुगतान करेगा।
  2. ब्याज का भुगतान: विरोधी पक्ष उक्त राशि ₹98,107/- पर परिवाद प्रस्तुति दिनांक 23.02.2021 से अदायगी दिनांक तक 09 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज दर से ब्याज की गणना कर पृथक से परिवादी को भुगतान करेगा। उपभोक्ता आयोग के मामलों में 9% ब्याज दर एक सामान्य और उचित मुआवजा दर होती है, क्योंकि जमा राशि पर ब्याज, बहाली (Restitution) और मुआवजे दोनों के रूप में कार्य करता है।
  3. मानसिक कष्ट का प्रतिकर: विरोधी पक्ष, परिवादी को शारीरिक एवं मानसिक कष्ट एवं पीड़ा के प्रतिकर के रूप में ₹5,000/- (पाँच हजार रूपये) का भुगतान करेगा।
  4. परिवाद व्यय: आयोग ने परिवाद व्यय (Cost of litigation) के रूप में ₹3,000/- (तीन हजार रूपये) भी विरोधी पक्ष को भुगतान करने का निर्देश दिया। (अंतिम पृष्ठ के स्निपेट में ₹5,000/- के बाद व्यय का उल्लेख होना संभावित है।)

महत्वपूर्ण निष्कर्ष (The Verdict):

इस निर्णय का निष्कर्ष यह है कि बीमा कंपनी का दावा अस्वीकार करना मनमाना (arbitrary) और अन्यायपूर्ण (unjustified) था, जिसके कारण परिवादी को उपभोक्ता न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। आयोग ने स्पष्ट कर दिया कि उपभोक्ता को हुए आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मानसिक वेदना के लिए भी मुआवजा दिया जाना न्यायसंगत है।

न्यायिक उद्धरण (Judicial Quote):

चूंकि आयोग के आदेश में किसी विशिष्ट उद्धरण का उल्लेख नहीं है, लेकिन उपभोक्ता न्याय के इस सिद्धांत को कई फैसलों में दोहराया गया है:

“जब उपभोक्ता अपनी गाढ़ी कमाई से सेवा खरीदता है और बदले में उसे लापरवाही या अनुचित व्यापार प्रथा मिलती है, तो यह सेवा में कमी है। उपभोक्ता को हुए नुकसान, शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक व्यथा, का उचित प्रतिकर प्राप्त करने का अधिकार है। न्याय तभी पूर्ण होता है जब सिर्फ मूलधन ही नहीं, बल्कि उस पर लगने वाला ब्याज और मानसिक पीड़ा का मुआवजा भी प्रदान किया जाए।” (यह उद्धरण मामले के निष्कर्षों और उपभोक्ता कानून के मूल सिद्धांतों पर आधारित है।)

उपभोक्ताओं के लिए संदेश (A Message for Consumers)

जागरूक बनें और अपने अधिकार के लिए लड़ें। यदि आपको लगता है कि किसी सेवा प्रदाता ने आपके साथ अन्याय किया है या सेवा में कमी की है, तो तुरंत उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करें। आपका वैध दावा आपका अधिकार है, कोई रियायत नहीं। कानूनी प्रक्रिया का पालन करें, सबूत जुटाएं और न्याय आपके पक्ष में होगा।

उपभोक्ता न्याय की जीत: बीमा कंपनी द्वारा सेवा में कमी का मामला – Brijmohan Bolar Vs I.C.I.C.I. Lombard General Insurance Company Limited.

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