श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम भारतीय स्टेट बैंक एवं अन्य
उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर (छ.ग.) द्वारा दिनांक 18 नवंबर, 2025 को पारित एक ऐतिहासिक आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय आपदा और महामारी (जैसे कि कोविड-19) के दौरान हुई मृत्यु के मामलों में बीमा पॉलिसियों की व्याख्या उपभोक्ताओं के हित में उदारतापूर्वक की जानी चाहिए। यह लेख उपभोक्ता शिकायत संख्या DC/375/CC/9/2024 (श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम भारतीय स्टेट बैंक एवं अन्य) के विस्तृत तथ्यों, पक्षों के तर्कों और आयोग के निष्कर्षों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस मामले में, आयोग ने भारतीय स्टेट बैंक जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को ऋण बीमा दावा (Loan Insurance Claim) अवैध रूप से अस्वीकार करने के लिए दोषी पाया, जिसने बीमा अनुबंधों में अस्पष्टता और अपवर्जन (Exclusion) खंडों की संकीर्ण व्याख्या पर एक मजबूत न्यायिक नज़ीर स्थापित की।

1. श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम भारतीय स्टेट बैंक, मामले का विवरण, पक्षकार एवं पीठासीन अधिकारी
| विवरण | जानकारी |
| परिवाद प्रकरण क्रमांक | DC/375/CC/09/2024 |
| न्यायाधिकरण | जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर (छ.ग.) |
| अंतिम आदेश दिनांक | 18 नवंबर, 2025 |
| परिवाद प्रस्तुति दिनांक | 27 दिसंबर, 2023 |
| अंतिम तर्क दिनांक | 23 अक्टूबर, 2025 |
पीठासीन अधिकारी (Presiding Officers)
आयोग का फैसला निम्नलिखित माननीय सदस्यों के समक्ष सुनाया गया, जिसमें सदस्य आलोक कुमार पाण्डेय ने आदेश लिखा:
- माननीय आनंद कुमार सिंघल: अध्यक्ष
- माननीय श्रीमती पूर्णिमा सिंह: सदस्य
- माननीय आलोक कुमार पाण्डेय: सदस्य (द्वारा आदेश लिखित )
पक्षकार (Parties) और अधिवक्ता
| भूमिका | पक्षकार का नाम | अधिवक्ता का नाम |
| परिवादिनी (Complainant) | श्रीमती गिरजा जांगड़े (स्व. बुटारी दास जांगड़े की पत्नी एवं उत्तराधिकारी) | श्री नवीन प्रजापति |
| विरोधी पक्षकार क्र. 01 (OP-1) | भारतीय स्टेट बैंक, शाखा प्रबंधक, बड़ा बाजार रोड, मुंगेली (छ.ग.) | श्री नवीन बिसेन |
| विरोधी पक्षकार क्र. 02 (OP-2) | भारतीय स्टेट बैंक जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, बिलासपुर (छ.ग.) | श्री राजदीप छाबड़ा |
Table of Contents
2. मामले के मुख्य तथ्य एवं घटनाक्रम (Key Facts and Timeline) श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम भारतीय स्टेट बैंक
यह मामला ऋण बीमा पॉलिसी की वैधता अवधि के दौरान बीमित व्यक्ति की कोविड-19 संक्रमण के कारण हुई अचानक मृत्यु और उसके बाद बीमा दावे के अस्वीकार होने से उत्पन्न हुआ।
श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम भारतीय स्टेट बैंक
| तिथि/घटनाक्रम | विवरण |
| 07 नवंबर, 2020 | परिवादिनी के पति, स्व. बुटारी दास जांगड़े ने विरोधी पक्षकार क्र. 01 (SBI) से ऋण खाता क्र. 38371726845 के तहत ₹1,14,081/- का पर्सनल लोन प्राप्त किया। |
| 07 नवंबर, 2020 | विरोधी पक्षकार क्र. 02 (SBI जनरल इंश्योरेंस) द्वारा ऋण की सुरक्षा हेतु पॉलिसी संख्या 0000000019744934 जारी की गई। |
| 07 नवंबर, 2020 – 06 नवंबर, 2021 | पॉलिसी की वैधता अवधि। |
| 23 अप्रैल, 2021 | बीमित व्यक्ति, श्री बुटारी दास जांगड़े, को कोविड-19 से संक्रमित होने के कारण अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। उनकी उसी दिन, अचानक हृदय गति रुकने (Sudden Cardio Respiratory Arrest) के कारण मृत्यु हो गई। (मृत्यु प्रमाण पत्र प्रदर्श-सी-05) |
| 26 अप्रैल, 2023 | परिवादिनी द्वारा विरोधी पक्षकार क्र. 01 के माध्यम से बीमा दावा (दावा क्र. 1740971) प्रस्तुत किया गया। |
| 08 अगस्त, 2023 | विरोधी पक्षकार क्र. 02 (बीमा कंपनी) द्वारा बीमा दावा अस्वीकार कर दिया गया। |
| 27 दिसंबर, 2023 | परिवादिनी द्वारा जिला उपभोक्ता आयोग में परिवाद दायर किया गया। |
3. पक्षकारों के तर्क एवं आधार (Arguments of the Parties)
परिवादिनी (श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम भारतीय स्टेट बैंक) के तर्क
परिवादिनी का मुख्य तर्क यह था कि बीमित व्यक्ति की मृत्यु बीमा पॉलिसी की वैधता अवधि के भीतर हुई। बीमा कंपनी (OP-2) ने यह आश्वासन दिया था कि अवधि के दौरान मृत्यु होने पर संपूर्ण ऋण राशि का भुगतान बैंक को किया जाएगा। बीमा कंपनी द्वारा दावा अस्वीकार करने का आधार असत्य था।
- दावा अस्वीकृति का खंडन: बीमा कंपनी ने दावा मधुमेह (Diabetes Mellitus – DM) के कारण मृत्यु होने की वजह से निरस्त किया, जबकि मृत्यु का कारण कोविड-19 संक्रमण से उत्पन्न हुई अचानक हृदय गति रुकना था।
- सेवा में कमी: असत्य आधार पर दावा निरस्त करना स्पष्ट रूप से ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) है।
- अनुतोष की मांग: परिवादिनी ने बीमा दावा राशि ₹1,14,081/- पर 12% वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान, मानसिक क्षतिपूर्ति के लिए ₹25,000/- और वाद व्यय की मांग की।
विरोधी पक्षकार क्र. 01 (भारतीय स्टेट बैंक – SBI) के तर्क
श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम भारतीय स्टेट बैंक
एसबीआई ने अपनी प्रतिरक्षा में कहा कि उसका कार्य केवल बैंकिंग का है और उसने खातेदार (स्व. बुटारी दास) को ऋण दिया था, जिसका बीमा खातेदार ने विरोधी पक्षकार क्र. 02 से कराया था।
दायित्व से मुक्ति: बीमा संबंधी समस्त दस्तावेजों की जांच और दावा भुगतान का दायित्व बीमा कंपनी (OP-2) का है। बैंक ने केवल दावा कंपनी को अग्रेषित किया था।
ऋण की स्थिति: बैंक ने यह भी सूचित किया कि बुटारी दास द्वारा प्राप्त ऋण का ब्याज सहित कोई बकाया वर्तमान में शेष नहीं है, क्योंकि उक्त ऋण बीमा दावा भुगतान उनके ऋण खातों में समझौते के तहत भुगतान समायोजन के माध्यम से किया जा चुका है। इसलिए, बैंक की ओर से सेवा में कोई कमी नहीं थी।
विरोधी पक्षकार क्र. 02 (SBI जनरल इंश्योरेंस) के तर्क
श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम SBI जनरल इंश्योरेंस
बीमा कंपनी ने दावा अस्वीकार करने के लिए दो मुख्य आधार प्रस्तुत किए:
- क्रिटिकल इलनेस एक्सक्लूज़न: मृत्यु प्रमाण पत्र के अवलोकन से पता चला कि मृत्यु कोविड-19 के मामले में अचानक हृदय गति रुकने या मधुमेह और कोरोनरी धमनी रोग (CAD) के कारण हुई थी। बीमा कंपनी के अनुसार, उक्त बीमारियाँ पॉलिसी की गंभीर बीमारियों (Critical Illness) की सूची में शामिल नहीं हैं, इसलिए दावा अस्वीकार कर दिया गया।
- कानूनी अनुबंध: पॉलिसीधारक और बीमा कंपनी के बीच एक कानूनी अनुबंध है और पक्षकार उसकी शर्तों से बंधे हैं। दावा, नीति के नियम और शर्तों के अनुसार निरस्त किया गया है।
4. आयोग के निष्कर्ष एवं न्यायिक विश्लेषण (Commission’s Findings and Reasoning)
आयोग ने उभयपक्ष के तर्कों और अभिलेखगत सामग्री का परिशीलन करने के बाद विरोधी पक्षकार क्र. 02 (बीमा कंपनी) के विरूद्ध ‘सेवा में कमी’ का निष्कर्ष निकाला।
कोविड-19 और अपवर्जन (Exclusion) पर निष्कर्ष
आयोग ने बीमा कंपनी के इस आधार को अस्वीकार कर दिया कि कोविड-19 ‘क्रिटिकल इलनेस’ की सूची में नहीं है।
- महामारी का स्वरूप: आयोग ने बल दिया कि कोविड-19 संक्रमण सन् 2020-21 के दौरान एक राष्ट्रीय महामारी थी, जिससे बीमित व्यक्ति की अकस्मात मृत्यु हो गई थी।
- स्पष्ट अपवर्जन की आवश्यकता: आयोग ने पाया कि बीमा पॉलिसी में कोविड-19 को किसी स्पष्ट अपवर्जन (Exclusion) में नहीं रखा गया था। आयोग के मतानुसार, यदि बीमा कंपनी ऐसी मृत्यु को अपवर्जित करना चाहती थी, तो उसे शर्तों में स्पष्ट रूप से उल्लेख करना अपेक्षित था।
- तकनीकी आधार की अस्वीकृति: कोविड-19 को क्रिटिकल इलनेस की सूची में न होने के कारण दावा अस्वीकार करना एक तकनीकी आधार है जो बीमा कंपनी के उदार भावनाओं के विपरीत है, और अनुबंध की शर्तों की गलत व्याख्या है।
न्यायिक दृष्टांतों का उपयोग (Smt Girja jangade Vs State Bank of India)
आयोग ने अपने निष्कर्षों को दो महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांतों से पुष्ट किया:
- मनमोहन नंदा विरूद्ध यूनाईटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमि. और अन्य (2022 (4) SCC 582):
- सिद्धांत: माननीय उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि बीमा धारक को अचानक बीमारी होती है, जिसे पॉलिसी के तहत स्पष्ट रूप से बाहर नहीं रखा गया है, तो बीमाकर्ता पर यह कर्तव्य है कि वह परिवादी/बीमित व्यक्ति को उसके तहत हुए खर्चे की प्रतिपूर्ति करे।
- लागू करना: आयोग ने इसे वर्तमान मामले में लागू करते हुए कहा कि कोविड-19 संक्रमण एक अचानक उत्पन्न बीमारी है और इसे पॉलिसी में अपवर्जित नहीं किया गया है।
- पिंकी देवी शर्मा विरूद्ध सहारा इंडिया और एक अन्य (2013) CPJ 177:
- सामाजिक अधिनियम: आयोग ने इस न्याय दृष्टांत का हवाला देते हुए प्रतिपादित किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक सामाजिक अधिनियम है, जिसकी व्याख्या उपभोक्ता के हित में उदारतापूर्वक की जानी अपेक्षित है।
पूर्व-विद्यमान बीमारी (Pre-Existing Disease – DM/CAD) पर निष्कर्ष
श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम भारतीय स्टेट बैंक
बीमा कंपनी के इस तर्क पर कि बीमित व्यक्ति मधुमेह और धमनी रोग से पीड़ित था (जो मृत्यु प्रमाण पत्र में ‘Known case of DM & CAD’ अंकित था), आयोग ने इसे भी बलहीन पाया।
- प्रमाण का अभाव: बीमा कंपनी ने न तो किसी चिकित्सक का विशेषज्ञ अभिमत, न कोई पूर्व उपचार की रिपोर्ट, और न ही अन्य कोई सुसंगत दस्तावेज प्रस्तुत किया जिससे यह सिद्ध हो सके कि बुटारी दास जांगड़े किसी पूर्व-विद्यमान रोग से ग्रसित थे।
- छिपाव का साक्ष्य: बीमा कंपनी यह सिद्ध करने में पूर्णतः असफल रही कि परिवादिनी के पति को किसी प्रकार की पूर्व बीमारी की जानकारी थी अथवा उसने जान-बूझकर उसे छिपाया था।
इन सभी आधारों पर, आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि बीमा कंपनी द्वारा पूर्व विद्यमान बीमारी एवं कोविड-19 को गंभीर बीमारी की श्रेणी में न आने का आधार लेकर दावा अस्वीकृत करना स्पष्ट रूप से ‘सेवा में कमी’ को दर्शाता है।
5. अंतिम निर्णय एवं आदेश की सारांश (Judgment and Order Summary)
आयोग ने परिवादिनी के पक्ष में फैसला सुनाया और विरोधी पक्षकार क्र. 02 (एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड) को सेवा में कमी के लिए उत्तरदायी ठहराया। विरोधी पक्षकार क्र. 01 (भारतीय स्टेट बैंक) को दायित्व से मुक्त कर दिया गया, क्योंकि बैंक ने पहले ही ऋण खातों में समायोजन कर लिया था।
विरोधी पक्षकार क्र. 02 को आदेश की प्रति प्राप्ति की तिथि से 45 दिवस की अवधि के भीतर निम्नलिखित भुगतान करने का निर्देश दिया गया:
श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम भारतीय स्टेट बैंक
- बीमित राशि का भुगतान:
- बीमित संपूर्ण राशि (Sum Assured): ₹1,14,081/- (एक लाख चौदह हजार इक्यासी रुपये) का भुगतान श्रीमती गिरजा जांगड़े को करे।
- ब्याज का भुगतान:
- उक्त राशि पर परिवाद प्रस्तुति दिनांक (27.12.2023) से अदायगी दिनांक तक 9% वार्षिक की दर से साधारण ब्याज का भुगतान करे।
- मानसिक अभित्रास एवं वाद व्यय:
- मानसिक अभित्रास (Mental Agony) के प्रतिकर के रूप में ₹25,000/- (पच्चीस हजार रुपये) का भुगतान करे।
- वाद व्यय (Litigation Cost) के रूप में ₹5,000/- (पांच हजार रुपये) का भुगतान करे।
श्रीमती गिरजा जांगड़े बनाम भारतीय स्टेट बैंक
यह आदेश उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के सामाजिक उद्देश्य को मजबूत करता है, जिसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि महामारी जैसे अप्रत्याशित संकटों के कारण हुए दावों को बीमा कंपनियाँ केवल तकनीकी आधारों पर अस्वीकार न कर सकें। यह फैसला भारत में बीमा दावों के निपटान के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है, जो उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करता है।
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