महासमुंद उपभोक्ता आयोग: सुश्री शेख शबाना विरुद्ध बजाज एलायंज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड

महासमुंद उपभोक्ता आयोग, छत्तीसगढ़ में अक्सर देखा जाता है कि दुर्घटना या किसी अनहोनी के बाद आम आदमी के हक का पैसा रोके जाने की संभावना होती है। लेकिन जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, महासमुंद ने एक जजमेंट में स्पष्ट कर दिया है कि बीमा कंपनी बेतुके शेयर की यह मांग कर परेशान नहीं कर सकती है। आयोग ने बजाज एलायंज जनरल कंपनी को ऑर्डर दिया है कि वह प्राइवेट व्हीकल्स के साथ मिलकर साइको सैंटैप और वाद्य व्यय का भुगतान करे।
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क्या था पूरा मामला?
यह कानूनी लड़ाई बागबाहरा निवासी सुश्री शेख शबाना (पिता शेख सुभानी, उम्र 25 वर्ष) और बजाज एलायंज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के बीच थी । घटना की शुरुआत 24 जून 2022 को हुई, जब शबाना ने अनंत होण्डा झलप चौक से एक श्एक्टिवा 6-जीश् स्कूटी (रजिस्ट्रेशन नंबर CG-06-GW-8620) खरीदी थी । यह वाहन आई.डी.एफ.सी. फर्स्ट बैंक से फाइनेंस कराया गया था ।
मुसीबत तब शुरू हुई जब 29 मई 2024 की रात करीब 12 बजे घर के बाहर खड़ी इस स्कूटी में अचानक तकनीकी खराबी के कारण आग लग गई । इस आगजनी में वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। परिवादी ने तुरंत इसकी सूचना स्थानीय थाना बागबाहरा में दी और 1 जून 2024 को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करवाई ।
बीमा कंपनी का इनकार और कानूनी मोड़
शबाना ने जब बीमा कंपनी से क्लेम के लिए संपर्क किया, तो कंपनी के सर्वेयर ने जांच तो की और क्लेम नंबर (OC252303187100000231) भी जारी किया, लेकिन भुगतान करने में टालमटोल शुरू कर दी । कंपनी ने परिवादी से ‘Manufacturer Technical Report’ (निर्माता की तकनीकी रिपोर्ट) की मांग की ।
जब शबाना यह रिपोर्ट देने में असमर्थ रही, तो बीमा कंपनी ने 2 जनवरी 2025 को पत्र भेजकर उनके दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया । हार मानकर बैठने के बजाय, शबाना ने अधिवक्ता श्री ए.के. जिलानी के माध्यम से 19 फरवरी 2025 को उपभोक्ता आयोग में परिवाद दायर किया ।
महासमुंद उपभोक्ता आयोग की कड़ी टिप्पणी : दस्तावेज जुटाना कंपनी की जिम्मेदारी
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग के अध्यक्ष श्री गोपाल रंजन पाणिग्राही और सदस्य श्री गिरीश श्रीवास्तव ने पाया कि बीमा कंपनी का रुख टालमटोल वाला था । आयोग ने अपने फैसले में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही I “Manufacturer Technical Report परिवादी द्वारा धारित वाहन से संबंधित आवश्यक दस्तावेजों की श्रेणी में नहीं आता है।”
आयोग ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसी किसी रिपोर्ट की आवश्यकता थी, तो बीमा कंपनी स्वयं निर्माता या डीलर से संपर्क कर इसे प्राप्त कर सकती थी, क्योंकि यह आम उपभोक्ता के अधिकार क्षेत्र या पहुंच में नहीं होता । कंपनी द्वारा इस आधार पर क्लेम निरस्त करना सेवा में कमी (Deficiency in Service) माना गया ।
अदालत का फैसला: उपभोक्ता को मिला न्याय
आयोग ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों (प्रदर्श सी-1 से सी-9) का अवलोकन करने के बाद 11 दिसंबर 2025 को अपना फैसला सुनाया । आयोग ने आदेश दिया कि:
बीमा राशि: बीमा कंपनी परिवादी को वाहन की IDV वैल्यू के अनुसार 60,943 रुपये का भुगतान करे 。
ब्याज: परिवाद पेश करने की तिथि (19/02/2025) से लेकर वसूली तक 6% वार्षिक ब्याज भी देना होगा 。
मानसिक क्षतिपूर्ति: मानसिक पीड़ा के लिए 10,000 रुपये का मुआवजा ।
वाद व्यय: अदालती कार्यवाही के खर्च के रूप में 5,000 रुपये अतिरिक्त देने होंगे ।
यह सभी भुगतान 45 दिनों के भीतर करने का निर्देश दिया गया है । यह फैसला उन हजारों उपभोक्ताओं के लिए एक उम्मीद की किरण है जो बीमा कंपनियों की जटिल कागजी कार्रवाई के जाल में फंसकर अपना हक खो देते हैं।
क्या आपके साथ भी बीमा कंपनी ने ऐसा किया है? यह मामला याद दिलाता है कि उपभोक्ता के रूप में आपके पास अधिकार हैं। यदि कंपनी किसी ऐसे दस्तावेज की मांग करती है जो आपके पास होना संभव नहीं है, तो आप भी उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
निष्कर्ष और संदेश
यह फैसला स्पष्ट करता है कि बीमा पॉलिसी केवल प्रीमियम वसूलने का जरिया नहीं है, बल्कि यह एक विश्वास है। यदि उपभोक्ता ने सभी बुनियादी दस्तावेज (जैसे RC, FIR, Insurance Policy) जमा कर दिए हैं, तो बीमा कंपनी उसे तकनीकी बारीकियों में उलझाकर लाभ से वंचित नहीं कर सकती।
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