उपभोक्ता न्याय का मील का पत्थर: “M.K. Agrawal Hojri Pvt. Ltd. vs New India Assurance 2025
(उपभोक्ता केस संख्या 269/2012)

Table of Contents
1. प्रस्तावना और मामले की पृष्ठभूमि उपभोक्ता न्याय का मील का पत्थर: M.K. Agrawal Hojri Pvt. Ltd. vs New India Assurance 2025
राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC), नई दिल्ली, द्वारा दिनांक 12 नवंबर, 2025 को सुनाया गया यह निर्णय भारत में बीमा दावों के निपटान में विलंब और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत ‘सेवा में कमी’ की अवधारणा को स्पष्ट करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस मामले की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति ए.पी. साही, अध्यक्ष, और माननीय श्री भरतकुमार पांड्या, सदस्य की पीठ द्वारा की गई थी।
फैसले को 07 अक्टूबर, 2025 को सुरक्षित रखा गया था। यह शिकायत मुख्य रूप से बीमा कंपनी द्वारा एक बड़ी अग्नि दुर्घटना के संबंध में दावे के निपटान में अत्यधिक और अनुचित देरी के कारण उत्पन्न हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप शिकायतकर्ता के बैंक खाते को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित कर दिया गया था।
शिकायतकर्ता, एम.के. अग्रवाल होजरी (पी) लिमिटेड, जो लुधियाना स्थित सिंथेटिक बुने हुए मुद्रित कपड़े और कंबल के निर्माण के व्यवसाय में लगी एक फर्म है, ने विपरीत पक्ष, मैसर्स न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, से दो फायर पॉलिसियाँ खरीदी थीं:
- मानक अग्नि एवं विशेष जोखिम पॉलिसी (Standard Fire & Special Peril Policy): 27.06.2008 से 26.06.2009 तक की अवधि के लिए।
- बीमा राशि: ₹10 करोड़ (भवन, प्लांट एवं मशीनरी के लिए)।
- स्थान: C 234 और D 338, फेज-VIII, फोकल प्वाइंट, लुधियाना।
- फ्लोटर फायर पॉलिसी (Floater Fire Policy): 17.12.2008 को जारी की गई।
- बीमा राशि: ₹4.5 करोड़ (सभी प्रकार के स्टॉक के लिए)।
- स्थान: उपरोक्त समान पता।
2. पार्टियाँ और अधिवक्तागण
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इस ऐतिहासिक उपभोक्ता मामले में दोनों पक्षों का प्रतिनिधित्व देश के प्रतिष्ठित अधिवक्ताओं द्वारा किया गया था:
| पक्ष | नाम |
| शिकायतकर्ता (Complainant) | एम.के. अग्रवाल होजरी (पी) लिमिटेड (C-234, फेज-VIII, फोकल प्वाइंट, लुधियाना) |
| विपरीत पक्ष (Opposite Party) | मैसर्स न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (मंडल कार्यालय-III, लुधियाना और पंजीकृत कार्यालय, मुंबई) |
| पक्ष का प्रतिनिधित्व | अधिवक्तागण का नाम |
| शिकायतकर्ता के लिए | श्री सुमंत दे, श्री रोहित खुराना, और सुश्री सिमरन कौर, अधिवक्तागण |
| विपरीत पक्ष के लिए | श्री आदित्य कुमार और सुश्री इवा नाथ, अधिवक्तागण |
3. मामले के विस्तृत तथ्य और घटनाक्रम की कालक्रम सूची
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शिकायतकर्ता के परिसर में 26/27 अप्रैल, 2009 की मध्यरात्रि में लगभग 3:45 बजे एक भीषण अग्नि दुर्घटना हुई। आग पर काबू 27 अप्रैल, 2009 को दोपहर 2:00 बजे पाया जा सका। दमकल विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, आग आकस्मिक (accidental) थी।
| तिथि/वर्ष | मुख्य घटनाक्रम | संदर्भ |
| 26/27.04.2009 | शिकायतकर्ता के परिसर (C 234, फेज-VIII, लुधियाना) पर भीषण आग लगी। | |
| 02.05.2009 | विपरीत पक्ष ने सर्वेयर (मैसर्स रोहित कुमार एंड कंपनी) को नियुक्त किया, जिसने प्रारंभिक जाँच की। | |
| 15.06.2009 | शिकायतकर्ता ने सर्वेयर द्वारा माँगी गई आवश्यक जानकारी प्रस्तुत की। | |
| 06.07.2009 | शिकायतकर्ता ने कुल ₹8,08,71,327/- का दावा बिल उठाया और अंतरिम दावे (interim claim) के लिए अनुरोध किया। | |
| 16.09.2010 | सर्वेयर द्वारा अंतिम सर्वेक्षण और मूल्यांकन रिपोर्ट (Final Survey and Assessment Report – FSR) प्रस्तुत की गई। | |
| 02.03.2011 | सर्वे रिपोर्ट की प्रतिलिपि शिकायतकर्ता को प्रदान की गई, जिसमें ₹5,50,07,530/- के नुकसान का आकलन किया गया था। | |
| 21.03.2011 | शिकायतकर्ता ने विपरीत पक्ष के अध्यक्ष से जल्द से जल्द दावा निपटाने का अनुरोध किया क्योंकि उनका बैंक खाता NPA घोषित होने वाला था। | |
| 01.04.2011 | यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने शिकायतकर्ता के खाते को NPA/डिफ़ॉल्ट खाता घोषित कर दिया। | |
| 15.06.2011 | विपरीत पक्ष ने शिकायतकर्ता को पत्र भेजकर केवल ₹5,49,45,964/- के दावे को मंज़ूरी दी। | |
| 16.06.2011 | शिकायतकर्ता को मंज़ूर राशि का भुगतान किया गया, और ‘पूर्ण एवं अंतिम निपटान’ के लिए ‘डिस्चार्ज वाउचर’ पर हस्ताक्षर करवाए गए। शिकायतकर्ता ने विरोध जताते हुए एक पत्र भी भेजा। | |
| 08.10.2012 | शिकायतकर्ता ने शेष दावा राशि, ब्याज़ और मुआवजे के लिए NCDRC के समक्ष वर्तमान शिकायत दर्ज की। | |
| 19.11.2013 | NCDRC द्वारा विपरीत पक्ष का लिखित बयान (Written Statement) दाखिल करने का अधिकार बंद कर दिया गया। | |
| 11.09.2023 | माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने NCDRC के 19.11.2013 के आदेश को बरकरार रखा। |
शिकायतकर्ता ने दावा किया कि विपरीत पक्ष ने उन्हें “पूर्ण एवं अंतिम निपटान” शब्द मुद्रित डिस्चार्ज वाउचर पर बिना किसी टिप्पणी या आरक्षण के हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया, और ऐसा न करने पर स्वीकृत राशि का भुगतान भी रोक देने की धमकी दी। इस मजबूरी के तहत ही उन्होंने दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए।
4. विपरीत पक्ष का तर्क और शिकायतकर्ता का खंडन
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A. विपरीत पक्ष का तर्क (Opposite Party’s Contentions)
विपरीत पक्ष के अधिवक्ता, श्री आदित्य कुमार, ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता का दावा पूरी तरह से भ्रामक और योग्यता रहित है।
- सर्वेयर की रिपोर्ट अंतिम: दावा निपटान सर्वेयर की रिपोर्ट (16.09.2010) के आधार पर किया गया, जिसने ₹5,50,07,530/- का नुकसान आंका।
- देरी का कारण: देरी के लिए शिकायतकर्ता स्वयं जिम्मेदार है, जिसने आवश्यक दस्तावेज़ टुकड़ों में जमा किए और सर्वेयर के साथ सहयोग नहीं किया।
- पूर्ण और अंतिम निपटान: शिकायतकर्ता ने स्वीकृत राशि को पूर्ण एवं अंतिम निपटान के रूप में प्राप्त किया और स्वेच्छा से डिस्चार्ज वाउचर पर हस्ताक्षर किए। इसलिए, वे बाद में किसी भी शिकायत को उठाने के हकदार नहीं हैं।
- मूल्यांकन का आधार: चूंकि शिकायतकर्ता ने प्लांट, मशीनरी और भवन का पुनर्स्थापन (reinstatement) नहीं किया, इसलिए मूल्यांकन पुनर्स्थापन मूल्य आधार (Reinstatement Value Basis) के बजाय बाजार मूल्य आधार (Market Value Basis) पर किया गया, जिसमें उचित मूल्यह्रास (depreciation) लागू किया गया।
B. शिकायतकर्ता का खंडन (Complainant’s Rebuttal)
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शिकायतकर्ता के अधिवक्ता, श्री सुमंत दे, ने विपरीत पक्ष के तर्कों का कड़ा विरोध किया:
- स्वीकृति पर आपत्ति नहीं: बीमा कंपनी ने अपनी देयता स्वीकार की है, विवाद केवल दावे की राशि को मनमाने ढंग से कम करने और भुगतान में अत्यधिक देरी को लेकर है।
- डिस्चार्ज वाउचर पर बल: उन्होंने तर्क दिया कि बैंक द्वारा NPA घोषित किए जाने की आसन्न धमकी और ₹7 लाख प्रति माह के ब्याज बोझ के कारण वे दबाव में थे, जिसके तहत डिस्चार्ज वाउचर पर हस्ताक्षर करवाए गए।
- सर्वेयर की रिपोर्ट सर्वोपरि नहीं: माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय (न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रदीप कुमार, (2009) 7 SCC 787) का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि सर्वेयर की रिपोर्ट अंतिम शब्द नहीं है और इसे ‘पवित्र’ (sacrosanct) नहीं माना जा सकता।
- मूल्यह्रास में त्रुटि: उन्होंने तर्क दिया कि अधिकांश मशीनरी नई थीं, और मनमाना मूल्यह्रास (arbitrary depreciation) लागू किया गया।
- स्टॉक रजिस्टर: स्टॉक रजिस्टर न रखना कंपनी की पुरानी प्रथा थी, जिसकी जानकारी यूनियन बैंक ऑफ इंडिया को मासिक स्टॉक विवरणों के माध्यम से दी जाती थी, और सी.ए. द्वारा प्रमाणित खाते भी उपलब्ध थे।
5. आयोग का विश्लेषण और महत्वपूर्ण अललोकन (NCDRC’s Analysis and Important Notes) NCDRC ने शिकायत पर विचार करते हुए कई महत्वपूर्ण अवलोकन किए
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NCDRC ने शिकायत पर विचार करते हुए कई महत्वपूर्ण अवलोकन किए:
A. लिखित बयान और सर्वे रिपोर्ट की स्वीकार्यताः
- विपरीत पक्ष का लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार NCDRC द्वारा 19.11.2013 को बंद कर दिया गया था, जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 11.09.2023 को बरकरार रखा।
- हालांकि, सर्वेयर की रिपोर्ट (16.09.2010) बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 64यूएम के तहत एक सांविधिक रिपोर्ट (Statutory Report) है। शिकायतकर्ता ने भी अपने लिखित तर्कों में इसका हवाला दिया था। इसलिए, आयोग ने विवाद के निपटारे के लिए इसे रिकॉर्ड पर लेना उचित समझा।
B. नुकसान की मात्रा और मूल्यांकन की विधि:
- विपरित पक्ष का लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार NCDRC द्वारा 19.11.2013 को बंद कर दिया गया था, जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 11.09.2023 को बरकरार रखा।
- पुनर्स्थापन बनाम बाजार मूल्य: आयोग ने माना कि चूंकि शिकायतकर्ता ने भवन या प्लांट एवं मशीनरी का पुनर्स्थापन (reinstatement) नहीं किया, इसलिए उन्हें बीमा पॉलिसी की शर्तों के अनुसार बाजार मूल्य आधार (Market Value Basis) पर ही भुगतान किया जा सकता था।
- स्टॉक मूल्यांकन: सर्वेयर ने पाया कि शिकायतकर्ता कंपनी प्रभावित स्थल के लिए स्टॉक रजिस्टर नहीं रखती थी। इस कारण सर्वेयर के पास नुकसान का मूल्यांकन करने के लिए “संशोधित ट्रेडिंग खाते (Modified Trading Account)” और जी.पी. अनुपात विधि (G.P. Ratio Method) अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, जिसे आयोग ने स्टॉक स्थिति की गणना के लिए सबसे उचित कार्यप्रणाली माना।
- मूल्यह्रास और तर्कसंगतता: आयोग ने प्लांट एवं मशीनरी (75% से 10% तक) और भवन (10 वर्षों के लिए 2% वार्षिक) पर लगाए गए मूल्यह्रास दरों को मनमाना या अत्यधिक नहीं माना। आयोग ने जोर दिया कि सर्वेयर एक विशेषज्ञ होता है और उसके आकलन को तभी खारिज किया जा सकता है जब गंभीर और अस्पष्ट त्रुटियाँ स्थापित की गई हों, जो शिकायतकर्ता करने में विफल रहा।
C. सर्वेयर द्वारा निर्धारित नुकसान का सार (Market Value Basis)
| वस्तु | बीमा राशि (₹) | दावा राशि (₹) | सर्वेयर द्वारा निर्धारित राशि (₹) |
| भवन (Building) | 1.5 करोड़ | 2,25,80,100/- | 1,31,71,350/- |
| प्लांट एवं मशीनरी (P&M) | 4 करोड़ | 2,43,23,550/- | 1,09,53,427/- |
| स्टॉक्स (Stocks) | 4.5 करोड़ | 3,37,17,913/- | 3,09,17,753/- |
| कुल योग | 10 करोड़ | 8,08,71,327/- | 5,50,42,530/- |
| शुद्ध देयता (कटौती के बाद) | – | – | 5,49,45,964/- |
D. सेवा में कमी और जबरदस्ती:
- जबरदस्ती का खंडन: आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता ने डिस्चार्ज वाउचर पर हस्ताक्षर करने के 14 महीने बाद शिकायत दर्ज की। NCDRC ने बीमा कंपनी की इस दलील में प्रथम दृष्टया योग्यता पाई कि “जबरदस्ती या परिस्थितिजन्य दबाव” का तथ्यात्मक दावा पूरी तरह से unsubstantiated है।
- विलंब के लिए स्वीकारोक्ति: आयोग ने केवल एक ही कमी पाई: सर्वे रिपोर्ट जमा होने (16.09.2010) के एक महीने बाद दावा निपटान में हुई देरी। यह देरी IRDA के मौजूदा विनियमों (बीमाधारक संरक्षण विनियम, 2000) का उल्लंघन थी, और इसलिए इसे सेवा में कमी माना गया।
6. अंतिम आदेश और निष्कर्ष
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आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि नुकसान की मात्रा के संबंध में सर्वेयर के आकलन में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है। शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार (partly allowed) किया गया, और विपरीत पक्ष को केवल दावा निपटान में विलंब के लिए ब्याज के रूप में मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।
आयोग द्वारा दिए गए विशिष्ट निर्देश:
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विपरीत पक्ष (न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड) को शिकायतकर्ता को निम्नलिखित भुगतान करने का निर्देश दिया गया:
- ब्याज (Interest): स्वीकृत दावा राशि ₹5,49,45,964/- पर 9% प्रति वर्ष की साधारण ब्याज दर से भुगतान।
- ब्याज की अवधि: 16 अक्टूबर 2010 से 15 जून 2011 तक (अर्थात सर्वे रिपोर्ट की तारीख के एक महीने बाद से भुगतान की तारीख तक)।
- मुकदमे का खर्च (Litigation Cost): ₹50,000/- का कानूनी खर्च।
अनुपालन समय-सीमा और डिफ़ॉल्ट खंड (Default Clause): विपरीत पक्ष को यह भुगतान आदेश की तिथि से दो महीने की अवधि के भीतर करना होगा। यदि विपरीत पक्ष इस समय सीमा के भीतर भुगतान करने में विफल रहता है, तो लागू ब्याज दर 12% प्रति वर्ष तक बढ़ा दी जाएगी।
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इस ब्लॉग में उपयोग किया गया आदेश (Order Copy) eJagriti पोर्टल से प्राप्त किया गया है। यह जानकारी सिर्फ जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।
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निष्कर्ष: यह निर्णय स्पष्ट करता है कि बीमा कंपनी अपनी देयता के निर्धारण के लिए सर्वेयर की रिपोर्ट पर भरोसा कर सकती है, बशर्ते मूल्यांकन तर्कसंगत और सुस्थापित हो। हालांकि, यह निर्णय बीमा कंपनियों को समय पर दावों का निपटान करने की उनकी वैधानिक जिम्मेदारी की याद दिलाता है। NCDRC ने सेवा में कमी को केवल भुगतान में देरी तक ही सीमित रखा और विलंब के लिए ब्याज के रूप में मुआवजे की व्यवस्था की, इस प्रकार उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के अपने उद्देश्य को पूरा किया।