श्रीमती मीना देवी पाण्डेय विरूद्ध जी. आर. दोषी एवं के. एम. मेहता, इंस्टीट्युट ऑफ किडनी डिजीज एण्ड रिसर्च सेंटर, अहमदाबाद (गुजरात) 2025

श्रीमती मीना देवी पाण्डेय विरूद्ध जी. आर. दोषी

श्रीमती मीना देवी पाण्डेय विरूद्ध के. एम. मेहता, इंस्टीट्युट ऑफ किडनी डिजीज एण्ड रिसर्च सेंटर, अहमदाबाद (गुजरात)

श्रीमती मीना देवी पाण्डेय विरूद्ध इंस्टीट्युट ऑफ किडनी डिजीज एण्ड रिसर्च सेंटर

परिचय: मामला क्या था?

यह अपील श्रीमती मीना देवी पाण्डेय द्वारा जी. आर. दोषी एवं के. एम. मेहता, इंस्टीट्युट ऑफ किडनी डिजीज एण्ड रिसर्च सेंटर, अहमदाबाद (गुजरात) के विरुद्ध दायर की गई थी। श्रीमती पाण्डेय ने जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर के 21 जनवरी, 2025 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके परिवाद (शिकायत) को निरस्त कर दिया गया था ।

श्रीमती मीना देवी पाण्डेय विरूद्ध जी. आर. दोषी

अपीलार्थी/परिवादिनी (श्रीमती मीना देवी पाण्डेय) के पति, स्वर्गीय श्री कृष्ण कुमार पाण्डेय, किडनी संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। उन्होंने किडनी प्रत्यारोपण के लिए विपक्षी संस्थान से संपर्क किया और विभिन्न तिथियों पर ₹2,00,000/- (दो लाख रुपये) की अग्रिम राशि जमा की थी ।

विवाद का मूल : श्रीमती मीना देवी पाण्डेय विरूद्ध जी. आर. दोषी

परिवादिनी का पक्ष

परिवादिनी का तर्क था कि उन्होंने किडनी प्रत्यारोपण के लिए अग्रिम राशि जमा की थी । हालांकि, किडनी प्रत्यारोपण से पहले ही उनके पति की मृत्यु 15 अक्टूबर, 2019 को हो गई । उन्होंने संस्थान से जमा अग्रिम राशि की वापसी का निवेदन किया, जिसे संस्थान ने अस्वीकार कर दिया। परिवादिनी ने इसे सेवा में कमी (Service Deficiency) माना और जिला आयोग में परिवाद दायर किया

विपक्षी संस्थान का बचाव

विपक्षी संस्थान ने दावा किया कि परिवादिनी की ओर से कुल ₹5,22,844/- जमा किए गए थे, जबकि इलाज पर कुल खर्च ₹5,34,937.36/- हुआ था । उन्होंने यह भी कहा कि बिल में से ₹2,54,071/- का अस्थायी कन्सेशन (छूट) दिया गया था, जो अग्रिम जमा राशि में से वसूली योग्य था । उन्होंने यह कहते हुए राशि वापस करने से इनकार कर दिया कि अग्रिम जमा राशि पहले ही खर्च हो चुकी थी, और वे सेवा में कमी से इनकार करते हैं । संस्थान ने यह भी स्वीकार किया कि किडनी प्रत्यारोपण हेतु ₹2,00,000/- अग्रिम जमा करने के आधार पर उन्होंने पी.एम. फंड से ₹1,50,000/- भी प्राप्त किए थे

संस्थान ने यह भी स्पष्ट किया कि मानव अंग का वाणिज्यिक लेनदेन (खरीद-बिक्री) Transplantation of Human Organ and Tissue Act-1994 की धारा 19 के तहत दंडनीय अपराध है, और परिवादिनी का यह कथन असत्य है कि जमा राशि में किडनी का मूल्य शामिल था । आयोग ने भी माना कि मानव अंग किसी भी स्थिति में क्रय या विक्रय नहीं किया जाता है ।

राज्य आयोग का निष्कर्ष और आदेश : श्रीमती मीना देवी पाण्डेय विरूद्ध जी. आर. दोषी

माननीय न्यायमूर्ति श्री गौतम चौरड़िया (अध्यक्ष) और माननीय श्री प्रमोद कुमार वर्मा (सदस्य) की पीठ ने अंतिम तर्कों को सुना और मूल अभिलेख का अवलोकन किया । आयोग ने अपने आदेश में निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष दिए:

  1. उपभोक्ता संबंध की स्थापना: आयोग ने माना कि इलाज हेतु अग्रिम राशि जमा करके चिकित्सा सेवा प्राप्त करने के लिए शुल्क का भुगतान किया गया था, जो अपीलार्थी/परिवादिनी और विपक्षी संस्थान के बीच “उपभोक्ता” और “सेवा प्रदाता” का संबंध स्थापित करता है ।
  2. अग्रिम राशि की प्रकृति: यह प्रमाणित हुआ कि जमा की गई ₹2,00,000/- की राशि किडनी ट्रांसप्लांट (प्रत्यारोपण) हेतु अग्रिम (Advance) के रूप में थी, जैसा कि रसीदों पर उल्लेखित “एकाउंट CADIVER ADVANCE” से स्पष्ट होता है ।
  3. सेवा में कमी: चूंकि किडनी प्रत्यारोपण (जिसके लिए अग्रिम भुगतान किया गया था) से पहले ही मरीज की मृत्यु हो गई और कोई उपचार प्राप्त नहीं हुआ, इसलिए संस्थान को अग्रिम राशि वापस करनी थी । आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि संस्थान द्वारा उक्त राशि न लौटाना सेवा में कमी है । जिला आयोग द्वारा इस तथ्य पर ध्यान न देना और त्रुटिपूर्ण आदेश पारित करना सही नहीं था ।

अंतिम निर्णय : श्रीमती मीना देवी पाण्डेय विरूद्ध जी. आर. दोषी

आयोग ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए (Partly Allowed) जिला आयोग के 21 जनवरी, 2025 के आदेश को अपास्त (खारिज) कर दिया । आयोग ने विपक्षी संस्थान को आदेश दिया कि:

  • ₹2,00,000/- की वापसी: संस्थान, आदेश दिनांक (17 अक्टूबर, 2025) से एक माह के भीतर, अग्रिम के रूप में जमा की गई ₹2,00,000/- की राशि अपीलार्थी/परिवादिनी को वापस प्रदान करेगा ।
  • ब्याज का भुगतान: इस राशि पर परिवाद प्रस्तुति दिनांक 21 जुलाई, 2020 से अदायगी दिनांक तक 06 प्रतिशत वार्षिक की दर से साधारण ब्याज भी प्रदान करेगा ।
  • क्षतिपूर्ति: संस्थान, अपीलार्थी/परिवादिनी को शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक परेशानी के मद में ₹20,000/- (बीस हजार रुपये) और वादव्यय (कानूनी खर्च) के मद में ₹10,000/- (दस हजार रुपये) भी पृथक से अदा करेगा ।

श्रीमती मीना देवी पाण्डेय विरूद्ध के. एम. मेहता, इंस्टीट्युट ऑफ किडनी डिजीज एण्ड रिसर्च सेंटर, अहमदाबाद (गुजरात)

निष्कर्ष: उपभोक्ताओं के लिए संदेश

17 अक्टूबर, 2025 को सुनाया गया यह निर्णय उन सभी उपभोक्ताओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण जीत है जो स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अग्रिम भुगतान करते हैं। यह स्थापित करता है कि यदि सेवा प्राप्त नहीं होती है (विशेषकर मृत्यु जैसे दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम में), तो सेवा प्रदाता के पास बिना उपचार प्राप्त की गई अग्रिम राशि को रोके रखने का कोई कानूनी या नैतिक अधिकार नहीं है। यह निर्णय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सेवा में कमी के मामलों में उपभोक्ताओं के अधिकारों को और मजबूत करता है।

न्यायिक शक्ति का प्रदर्शन ’’छ ग राज्य उपभोक्ता आयोग के 5 निर्णायक फैसले! CG State Commission Order.

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