
NCDRC Judgement 2025: उपभोक्ता अधिकारों की जीत
NCDRC Judgement 2025: भारत के उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा करने वाली सर्वाेच्च संस्था राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने वर्ष 2025 में एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने यह साबित कर दिया कि कोई भी सरकारी संस्था या बैंक उपभोक्ता के अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकता।
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यह मामला राजस्थान राज्य के जोधपुर से जुड़ा है जहाँ एक साधारण विधवा महिला इंदु बाला ने देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के खिलाफ अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया। यह ऐतिहासिक निर्णय अब NCDRC Judgement 2025: के नाम से जाना जा रहा है और पूरे देश में उपभोक्ता जागरूकता का प्रतीक बन गया है।
मामले की शुरुआत: 6,51,510 रुपये की ग्रेच्युटी पर विवाद
यह कहानी वर्ष 2010 से शुरू होती है। इंदु बाला के पति, जो कि मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (MES) में कार्यरत थे, का निधन हो गया। सरकारी नियमों के अनुसार, उनके परिवार को पेंशन और ग्रेच्युटी का भुगतान किया जाना था। 10 दिसंबर 2010 को पेंशन भुगतान आदेश (Pension Payment Order) जारी किया गया, जिसमें यह साफ लिखा गया था कि इंदु बाला को ₹6,51,510/- की मृत्यु ग्रेच्युटी दी जानी चाहिए। लेकिन इसके बावजूद, बैंक ने भुगतान नहीं किया।
SBI का रवैया : नामांकन स्पष्ट नहीं का बहाना
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने यह तर्क दिया कि रिकॉर्ड में नामांकन (Nominee) स्पष्ट नहीं है, इसलिए भुगतान रोका गया। बैंक ने न तो कोई सुधार करवाया और न ही शिकायतकर्ता से स्पष्टता मांगी। यह लापरवाही करीब 5 वर्षों तक जारी रही जिससे इंदु बाला को कई बार बैंक के चक्कर लगाने पड़े।
गारिसन इंजीनियरिंग विभाग का पत्र सच्चाई सामने आई
जब बैंक ने कोई कदम नहीं उठाया, तो गारिसन इंजीनियरिंग विभाग (Garrison Engineering Department) ने 9 दिसंबर 2015 को बैंक को पत्र लिखा। इस पत्र में स्पष्ट किया गया था कि-
पेंशन भुगतान आदेश में इंदु बाला का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है और सभी दस्तावेज़ 03 जनवरी 2011 को ही बैंक को भेज दिए गए थे। विभाग ने यह भी कहा कि यदि अब भुगतान में देरी होती है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी बैंक की होगी। यह पत्र इस केस का निर्णायक साक्ष्य बन गया।
जिला उपभोक्ता आयोग, जोधपुर का फैसला: बैंक की लापरवाही साबित
इंदु बाला ने न्याय पाने के लिए जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग जोधपुर का दरवाजा खटखटाया। सभी दस्तावेजों की जांच के बाद आयोग ने पाया कि (SBI) की ओर से गंभीर लापरवाही हुई है।
आयोग ने आदेश दिया कि –
बैंक 6,51,510/- की ग्रेच्युटी राशि का भुगतान करे।
3,00,000/- मानसिक कष्ट के मुआवजे के रूप में दे।
5,000/- विधिक खर्च (Litigation Cost) भी अदा करे।
यह निर्णय उपभोक्ता अधिकारों की दिशा में एक बड़ी जीत थी।
राज्य आयोग राजस्थान में अपील: आंशिक राहत बैंक को
बैंक ने इस आदेश के खिलाफ राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील की। राज्य आयोग ने यह माना कि इंदु बाला का नाम पेंशन भुगतान आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज था और बैंक को कोई भ्रम नहीं होना चाहिए था।
राज्य आयोग ने कहा कि –
जब फैमिली पेंशन उसी नाम से दी जा चुकी है तो ग्रेच्युटी भुगतान रोकने का कोई औचित्य नहीं है। हालांकि आयोग ने मुआवजा राशि 3,00,000/- से घटाकर 1,00,000/- कर दी और ब्याज की अवधि जनवरी 2011 से दिसंबर 2015 तक तय की।
NCDRC में पुनरीक्षण याचिका – SBI की आखिरी कोशिश
बैंक ने इसके बाद राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) में पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition No- NC/RP/1687/2024) दायर की।
बैंक ने तर्क दिया कि – नामांकन प्रमाणपत्र नहीं दिया गया था।
शिकायतकर्ता ने 5 साल तक कोई कार्रवाई नहीं की। लेकिन NCDRC ने बैंक के इन सभी तर्कों को खारिज कर दिया।
NCDRC का फैसला: स्पष्ट नाम के बावजूद भुगतान रोकना लापरवाही
NCDRC Judgement 2025 में “माननीय न्यायमूर्ति ए. पी. साहि (President)” और माननीय श्री भारत कुमार पांड्या (Member) की पीठ ने कहा
पेंशन भुगतान आदेश में इंदु बाला का नाम स्पष्ट था। बैंक को भुगतान रोकने का कोई अधिकार नहीं था। यह बैंक की लापरवाही का स्पष्ट उदाहरण है। आयोग ने कहा कि जब बैंक ने पहले से ही उसी नाम पर फैमिली पेंशन दी है तो ग्रेच्युटी भुगतान रोकना अनुचित और अवैध है।
सुप्रीम कोर्ट के मामलों का हवाला
NCDRC ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई प्रमुख निर्णयों का हवाला दिया, जैसे –
Rubi (Chandra) Dutta vs United India Insurance Co- (2011/ 11 SCC 269)
Sunil Kumar Maity vs SBI (2022 Online SC 77)
Rajiv Shukla vs Gold Rush Sales & Services Ltd- (2022) 9 SCC 31)
आयोग ने कहा कि NCDRC केवल तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब आदेश में कोई गंभीर त्रुटि या गैरकानूनी कार्यवाही हो और इस मामले में ऐसा कुछ नहीं पाया गया।
अंतिम निर्णय – बैंक की पुनरीक्षण याचिका खारिज
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) ने बैंक की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।
इस तरह, आयोग ने राज्य आयोग के निर्णय को बरकरार रखा और इंदु बाला को न्याय दिलाया।
यह फैसला न केवल एक उपभोक्ता की जीत थी, बल्कि यह दिखाता है कि भारत में उपभोक्ता कानून अब कितना सशक्त हो चुका है।
NCDRC Judgement 2025 देखें इंदु बाला vs स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI)
इस केस से उपभोक्ताओं के लिए सीख
यह NCDRC Judgement 2025 उपभोक्ताओं के लिए कई अहम सीखें छोड़ता है कि हर उपभोक्ता को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना चाहिए।
यदि कोई बैंक या संस्था भुगतान में देरी करे तो तुरंत उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
सभी दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है।
उपभोक्ता अदालतें न केवल निजी कंपनियों बल्कि सरकारी संस्थानों के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकती हैं।
निष्कर्ष: NCDRC Judgement 2025 बना मिसाल
यह फैसला भारतीय उपभोक्ता कानून के इतिहास में एक मील का पत्थर Landmark Decision है। इसने यह साबित कर दिया कि कानून सबके लिए समान है चाहे वह आम नागरिक हो या सरकारी संस्था।
इंदु बाला जैसी साधारण महिला ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) जैसी बड़ी संस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की।
यह निर्णय सभी उपभोक्ताओं के लिए प्रेरणा है कि वे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं और अपने अधिकारों के लिए डटे रहें।
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